भारत में गर्भनिरोधक उपयोग और महिलाओं पर अभी भी दबाव: NFHS-6 से मिली जानकारियाँ

नई दिल्ली: भारत में गर्भनिरोधक उपयोग को आज केवल अनुपालन से हटाकर महिलाओं की मर्जी से विकसित करना अनेक सामाजिक और नीतिगत कदमों की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तभी संभव होगा जब महिलाओं की शिक्षा बढ़ेगी, बाल विवाह पर रोक लगेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक, पुनरावृत्तीय गर्भनिरोधक विधियों की सुविधा सुलभ होगी।
गर्भनिरोधक उपयोग पर आधारित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान में तो महिलाओं की निर्णय क्षमता सीमित है और अधिकतर गर्भनिरोधक उपयोग मजबूरी या दबाव के अंतर्गत होता है, न कि पूर्ण स्वीकृति के साथ। ऐसे में भारत को ऐसी नीतिगत निवेशों की आवश्यकता है जो इस स्थिति को बदल सकें।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि 18 वर्ष से पहले किसी भी लड़की की शादी न हो, इसके लिए कड़ी कानून प्रवर्तन जरूरी है। बाल विवाह न केवल लड़की के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि उसकी पढ़ाई और आर्थिक स्वतंत्रता के अवसरों को भी सीमित कर देता है। कॉलेज और ग्रामीण स्कूलों में द्वितीयक शिक्षा को बढ़ावा देने से लड़कियों को सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही परिवार नियोजन में वैज्ञानिक और पुनरावृत्तीय गर्भनिरोधक विधियों जैसे कंडोम, ओरल पिल्स, आईयूडी आदि तक आसान पहुंच देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर सामाजिक जागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि गर्भनिरोधक उपयोग केवल अनुपालन की नहीं बल्कि महिला के निर्णय की स्वतंत्रता हो। इससे महिला स्वास्थ्य में सुधार होगा और जन्म दर नियंत्रित होगी, जो देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है।
गर्भनिरोधक उपयोग को सहज, सुरक्षित और महिला केंद्रित बनाने के प्रयासों से न केवल महिलाओं की जीवन गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि परिवारों, समाज और पूरे राष्ट्र को भी मजबूती मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सही नीति और संसाधन निवेश से भारत में इस दिशा में बदलाव संभव है।
