जीवनशैली

नियामगिरि के डोंगरिया कुंड : जहां जंगल, भोजन और आस्था से जुड़ी है जीवनशैली

ओडिशा के नियामगिरि पर्वत क्षेत्र में बसे डोंगरिया कुंड जनजाति, जो भारत की विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों में से एक है, अपनी अनूठी जीवनशैली और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जानी जाती है। इन लोगों की दिनचर्या, जंगल से लेकर भोजन की उनकी परंपरा और उनकी आस्था तक गहराई से जुड़ी हुई है।

डोंगरिया कुंड जनजाति के लिए नियामगिरि पर्वत सिर्फ उनका निवास स्थान नहीं है बल्कि यह उनके धार्मिक विश्वास और दैनिक आवश्यकताओं का स्रोत भी है। जंगल से उन्हें खाने-पीने की सामग्री, औषधि और आवश्यक वस्तुएं मिलती हैं। यह क्षेत्र उनकी आत्मा से जुड़ा हुआ माना जाता है और इसे संरक्षित रखना उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन लोगों की संस्कृति में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एक मूलभूत तत्व है। वे जंगल की रक्षा करते हैं, जिससे न केवल उनकी जीवनशैली बनी रहती है, बल्कि आसपास के पर्यावरण का भी संतुलन बना रहता है। डोंगरिया कुंड की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियाम देवता (नियामरा) को जंगल में स्थापित माना जाता है और यही देवता उनकी सभी कार्यों में मार्गदर्शक के रूप में विराजमान हैं।

खान-पान की बात करें तो, डोंगरिया कुंड सादे, लेकिन पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता देते हैं। इनके भोजन में जंगल की विभिन्न जड़ी-बूटियों, फल, अनाज और शाकाहारी व्यंजन शामिल होते हैं। जंगल से संग्रहित प्राकृतिक संसाधनों से उनके जीवन में पोषण की कमी नहीं होती।

सरकार और विभिन्न सामाजिक संस्थाएं इन जनजातीय समुदाय के संरक्षण और विकास के लिए विभिन्न प्रयास कर रही हैं, ताकि उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके तथा उनकी प्राकृतिक संसाधन पर आधारित जीवनशैली बनी रहे।

डोंगरिया कुंड की कहानी केवल उनकी जीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत उदाहरण है कि किस प्रकार मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बना रह सकता है। नियामगिरि की घाटियों में यह जनजाति आज भी अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति सक्षम और समर्पित है, जो एक समृद्ध और स्थायी जीवन शैली की मिसाल पेश करती है।

Source

Back to top button