
कभी-कभी जीवन इतनी बड़ी परीक्षा लेता है कि इंसान का सब कुछ छिन जाता है, लेकिन उसके भीतर की हिम्मत नहीं।
रहठा गांव का नरेश काछी परिवार ऐसी ही एक मिसाल बन गया है।
प्रशासन की कार्रवाई में उनका मकान ढह गया, पर उनका आत्मविश्वास अब भी खड़ा है।
करीब 60 साल से यह परिवार उसी भूमि पर रह रहा था।
कर्ज लेकर बनाया गया मकान ही उनकी पहचान था।
जब अचानक नोटिस मिला और अगले दिन बुलडोजर पहुंच गया, तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।
लेकिन टूटी दीवारों और बिखरे ईंट-पत्थरों के बीच भी उनका हौसला नहीं टूटा।
नरेश कहते हैं, “हम मेहनत-मजदूरी करते हैं, फिर भी ईमानदारी से जीते हैं। घर टूट गया है, पर विश्वास नहीं।”
गांववालों के सहयोग से परिवार ने अस्थायी आश्रय बनाया।
कई लोग मदद को आगे आए।
यही दिखाता है कि मुश्किल समय में समाज की संवेदना ही असली ताकत है।
दीवारें गिर सकती हैं, लेकिन उम्मीदें नहीं।
रहठा के इस परिवार की कहानी बताती है कि असली दीपावली वह नहीं जब घर रोशनी से भर जाए, बल्कि वह जब दिलों में हिम्मत की ज्योति जलती रहे।
आज वे प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन उनका संघर्ष केवल अपने लिए नहीं — उन सभी के लिए है जो अपनी मेहनत की कमाई से जीवन बनाते हैं।
उनकी कहानी यह सिखाती है कि टूटे घरों से भी नई सुबह निकल सकती है, बस विश्वास और धैर्य बनाए रखना होता है।
