“उस दिन कानून किताबों से उतरकर लोगों के बीच आ गया” – एक सहभागी की यादें

मुझे आज भी याद है, 11 नवंबर की वह सुबह।
विद्यालय का प्रांगण लोगों से भरा था, मंच सजा था और सामने न्यायाधीश बैठे थे।
पहली बार लगा कि कानून केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे जीवन का हिस्सा है।
जब नरेन्द्र नाथ त्रिपाठी जी बोले — “न्याय सबका अधिकार है,” तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
मैंने पहली बार जाना कि कमजोर वर्गों, महिलाओं, बच्चों और विकलांगों को मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है।
जब 15100 टोल फ्री नंबर की घोषणा हुई, तो मन में भरोसा जागा कि अगर कभी जरूरत पड़ी, तो न्याय तक पहुँचना असंभव नहीं।
श्रीमती बच्ची देवी बनाम यूपी राज्य का उदाहरण सुनकर लगा कि कानून सच में आम आदमी के साथ खड़ा है।
कार्यक्रम समाप्त हुआ तो मन में संतोष था — जैसे किसी ने अंदर की अनिश्चितता को आश्वासन में बदल दिया हो।
वह दिन केवल एक आयोजन नहीं था, वह विश्वास का दिन था — कि न्याय जीवित है।
