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काचरेड़ा की आग — हमारी व्यवस्था की चिंगारी

काचरेड़ा गांव की घटना ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है —
क्या हमारे ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा का कोई ठोस ढांचा है?

एक साधारण शॉर्ट सर्किट से एक पूरा घर जल गया,
लाखों का नुकसान हुआ,
और एक परिवार की खुशियाँ राख में बदल गईं।

यह केवल “तकनीकी गलती” नहीं है —
यह हमारे प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता का परिणाम है।
बिजली विभागों में निरीक्षण का अभाव,
पुरानी तारें, और ग्रामीणों की शिकायतों पर उदासीन रवैया —
ये सभी मिलकर आग की चिंगारी को भड़काते हैं।

सरकारें योजनाएँ बनाती हैं,
पर उन योजनाओं की जमीनी सच्चाई कागज़ों में खो जाती है।
काचरेड़ा का परिवार उन हजारों परिवारों में से एक है
जो हर साल इसी तरह की लापरवाही की कीमत चुकाते हैं।

जरूरत है —
जवाबदेही की।
बिजली विभाग, पंचायत और प्रशासन — तीनों को यह समझना होगा कि
सुरक्षा केवल नियमों से नहीं,
बल्कि जागरूकता और कार्यवाही से आती है।

काचरेड़ा की राख में सिर्फ एक घर नहीं जला,
वहाँ हमारे सिस्टम की कमजोरियाँ भी उजागर हुई हैं।
अगर हमने अब भी इसे “दुर्भाग्य” कहकर भुला दिया,
तो कल किसी और गांव में यही कहानी दोहराई जाएगी।

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