एक सिपाही ने ईमानदारी और लगन से ठगे हुए 10 लाख लौटाकर जनता का भरोसा फिर से जगा दिया।

विषय: जब एक सिपाही ने उम्मीद लौटा दी — आरक्षी सुनील रावत की कहानी
कहते हैं, “सच्चा नायक वही होता है जो बिना शोर किए काम करता है।”
और सोनभद्र के आरक्षी सुनील रावत ने यही साबित किया।
एक तरफ़ जहाँ देशभर में साइबर अपराध बढ़ते जा रहे हैं, लोग अपनी मेहनत की कमाई खोकर निराश हो जाते हैं, वहीं इस जवान ने 42 पीड़ितों की ज़िंदगी में उम्मीद की लौ जलाई। उन्होंने ₹10,02,027 रुपये की राशि को समय रहते वापस दिलाकर यह दिखा दिया कि सच्ची निष्ठा और लगन से कोई भी असंभव कार्य संभव बन सकता है।
कल्पना कीजिए — जब किसी बुजुर्ग का बैंक बैलेंस शून्य हो जाता है, या किसी छात्र की फीस किसी ठग के खाते में चली जाती है — तब निराशा कैसी लगती होगी?
और फिर सोचिए — जब उसी इंसान को पुलिस से कॉल आता है —
“आपके पैसे वापस मिल गए हैं।”
वह क्षण किसी चमत्कार से कम नहीं होता।
सुनील रावत ने न केवल पैसे वापस दिलाए, बल्कि भरोसा भी लौटाया। उनका हर कदम इस बात की मिसाल है कि वर्दी सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक है।
वे घंटों सिस्टम पर बैठकर ट्रांज़ैक्शन ट्रैक करते हैं, बैंक और पोर्टल्स से समन्वय करते हैं, और हर केस को ऐसे देखते हैं जैसे वह उनका अपना मामला हो।
शायद यही वजह है कि उन्हें “कॉप ऑफ द मंथ” घोषित किया गया।
पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा ने जब उन्हें मंच पर बुलाया, तब पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। उस समय यह सिर्फ एक पुरस्कार समारोह नहीं था, यह एक संदेश था —
कि मेहनत, ईमानदारी और संवेदनशीलता कभी व्यर्थ नहीं जाती।
उनकी सफलता ने पूरे जनपद के पुलिसकर्मियों में एक नई ऊर्जा भरी है। अब हर जवान यह सोचता है कि “मैं भी सुनील रावत की तरह कुछ कर सकता हूँ।”
यह प्रेरणा ही किसी व्यवस्था की असली प्रगति होती है।
उनकी कहानी केवल पुलिस की नहीं, हर आम नागरिक की कहानी है — जो यह विश्वास करना चाहता है कि व्यवस्था अब बदल रही है, अब पुलिस मदद करने के लिए तत्पर है।
रावत की मुस्कान में आत्मविश्वास है, उनके शब्दों में विनम्रता है, और उनके कार्यों में सेवा की झलक।
वे कहते हैं —
“मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया, बस जो मेरा फर्ज़ था वही निभाया।”
लेकिन सच तो यह है कि आज जब हर कोई अपने स्वार्थ में उलझा है, तब किसी का अपना फर्ज़ ईमानदारी से निभाना ही सबसे बड़ा योगदान है।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि नायक हमेशा फिल्मी नहीं होते —
कभी-कभी वे हमारे बीच होते हैं, सादे वर्दी में, शांत स्वभाव में, और अडिग निष्ठा के साथ।
