मौर्य ने कहा, “राहुल गांधी अब इतिहास पढ़ाते हैं, राजनीति नहीं करते!”

‘बहादुरशाह ज़फर’ रूपक — क्या यह भारतीय राजनीति की नई भाषा है?
केशव प्रसाद मौर्य का बयान — “राहुल गांधी कांग्रेस के बहादुरशाह ज़फर बन चुके हैं” — एक वाक्य भर नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की उस शैली का उदाहरण है जहाँ इतिहास और व्यंग्य मिलकर एक संदेश देते हैं।
इस बयान का उद्देश्य केवल राहुल गांधी की आलोचना नहीं है, बल्कि कांग्रेस की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी भी है।
मौर्य ने जिस तरह से बहादुरशाह ज़फर का रूपक चुना, उसने कांग्रेस की स्थिति को ‘अंतिम संघर्ष’ के रूप में चित्रित कर दिया।
भाजपा नेताओं की भाषा अब प्रतीकवाद से भरी होती जा रही है।
जहाँ राहुल गांधी को ‘राजवंश का उत्तराधिकारी’ बताया जाता है, वहीं मोदी को ‘जनता से निकला नेतृत्व’ कहा जाता है।
यह विरोधाभास भाजपा की चुनावी रणनीति का केंद्र है।
राजनीतिक दृष्टि से, मौर्य का यह बयान राहुल गांधी पर नहीं, बल्कि विरासत आधारित राजनीति पर प्रहार है।
वह यह बताने की कोशिश है कि भारत की नई राजनीति परिवारों से नहीं, जनता के विश्वास से बनेगी।
संपादकीय रूप से देखा जाए तो यह वाक्य भारतीय लोकतंत्र की दिशा को भी संकेत देता है — जहाँ जनता भावनाओं से ऊपर उठकर काम और परिणाम को प्राथमिकता देने लगी है।
राजनीति में ऐसे बयान केवल वाद-विवाद नहीं, बल्कि जनता के मानस को झकझोरने वाले संदेश बन जाते हैं।
और यही कारण है कि मौर्य का यह वाक्य, चाहे विवादास्पद हो या प्रभावशाली, आने वाले समय में भारतीय राजनीतिक संवाद का हिस्सा बन चुका है।
